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Biography of Bhagat Singh in Hindi

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हजारों लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। ऐसे ही एक वीर और भारत को अंग्रेजो की गुलामी से मुक्त करवाने के लिए जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाई वो है महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह। जो बहुत ही छोटी उम्र में देश के लिए शहीद हो गए थे। आइये जानते है भगत सिंह के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारिया । Biography of Bhagat Singh in Hindi

Biography of Bhagat Singh in Hindi
Biography of Bhagat Singh in Hindi

भगत सिंह का जन्म | Birth of Bhagat Singh

भारत के सबसे प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक, भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को चाक नंबर 105 जीबी, बंगा गाँव, पंजाब प्रांत के लायलपुर जिले के जारणवाला तहसील में हुआ जो वर्तमान में पाकिस्तान में है। उनका जन्म एक सिख परिवार में हुआ था। भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। वह अपने माता पिता के तीसरे बेटे थे। उनका पैतृक गाँव पंजाब के नवांशहर जिले (अब नाम शहीद भगत सिंह नगर) में भारत के बंगा शहर के पास खटकर कलां था।

भगत सिंह का परिवार | Family of Bhagat Singh

भगत सिंह का परिवार राष्ट्रवाद से ओतप्रोत और स्वतंत्रता के लिए आंदोलनों में बढ़ चढ़ कर भाग लेने वाला था। भगत सिंह के दादा अर्जुन सिंह था। भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। भगत सिंह के 3 बहन और 5 भाई थे। भगत सिंह के जन्म के समय उनके पिता और दो चाचा, अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह की जेल से रिहा हुये थे। उनके चाचा सरदार अजित सिंह एक महान क्रांतिकारी थे। भगत सिंह के पिता और चाचा ग़दर पार्टी के सदस्य थे। भगत सिंह 13 वर्ष की आयु तक परिवार की क्रांतिकारी गतिविधियों से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे ।

भगत सिंह की शिक्षा | Education of Bhagat singh

भगत सिंह का परिवार सक्रिय रूप से राजनीतिक था। उनके दादा, अर्जुन सिंह ने स्वामी दयानंद सरस्वती के हिंदू सुधारवादी आंदोलन, आर्य समाज का अनुसरण करते थे। जिसका भगत सिंह पर काफी प्रभाव था। इसलिए भगत सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा दयानंद एंग्लो-वैदिक हाई स्कूल, लाहौर में हुई थी जो आर्य समाजी संस्था थी ।

1919 जलियांवाला बाग हत्याकांड जिसमे हजारों निहत्थे लोग जो एक सार्वजनिक सभा में एकत्रित हुए, गोलियों से मारे गए थे। इस घटना ने 12 साल के भगत सिंह पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। भगत सिंह ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। लेकिन 1922 के चौरी चौरा कांड के कारण गाँधी ने आंदोलन वापस ले लिया। जिससे भगत सिंह का महात्मा गांधी के अहिंसा के दर्शन से मोहभंग हो गया। और वो सहस्त्र क्रांति के द्वारा अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने की वकालत करने लगे।

1923 में भगत सिंह, लाहौर के नेशनल कॉलेज में पढ़ने चले गये, वहां उन्होंने पढ़ाई के साथ साथ कई प्रकार की गतिविधियों में भी भाग लिया। जिनमे ड्रामा (नाट्य मंचन) भी शामिल था। उन्होंने पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा आयोजित एक निबंध प्रतियोगिता जीती जिसमे उन्होंने पंजाब में समस्याओं पर लिखा था।

भगत सिंह एक उत्साही पाठक थे और वे यूरोपीय राष्ट्रवादी आंदोलनों के बारे में पढ़ते थे। फ्रेडरिक एंगेल्स और कार्ल मार्क्स के लेखन से प्रेरित होकर, उनकी राजनीतिक विचारधाराओं ने आकार लिया और उनका झुकाव समाजवादी दृष्टिकोण की ओर हो गया। उन्होंने कई छद्म नामों के तहत “वीर अर्जुन” जैसे अखबारों में भी लिखा।

भगत सिंह की शादी | Marriage of Bhagat Singh

जब घरवालों ने भगत सिंह की शादी करनी चाही तो वे कानपूर चले गये। उन्होंने अपने घर लिए एक पत्र छोड़ा था जिसमे उन्होंने शादी के बारे में लिखा कि:

“मेरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए, इसलिए कोई आराम या सांसारिक इच्छा नहीं है जो मुझे लुभा सकती है। यदि मेरी शादी गुलाम-भारत में हुई, तो मेरी दुल्हन केवल मृत्यु होगी।”

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह का योगदान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। भगत सिंह ने अपने कॉलेज दिनों में ही मार्च 1926 में भगत सिंह ने भारतीय समाजवादी युवा संगठन नौजवान भारत सभा की स्थापना की। इसके बाद वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में भी शामिल हो गए जिसके प्रमुख नेता चंद्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल और शाहिद अशफाकल्लाह खान जैसे महान क्रांतिकारी थे।

प्रारंभ में, भगत सिंह की गतिविधियाँ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संक्षिप्‍त लेख लिखने, सरकार को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से एक हिंसक विद्रोह के सिद्धांतों को रेखांकित करने, मुद्रित करने और वितरित करने तक सीमित थीं। युवाओं पर उनके प्रभाव, और अकाली आंदोलन में उनके सहयोग को देखते हुए, पुलिस ने उन्हें 1926 में लाहौर में हुए बमबारी मामले में गिरफ्तार किया। भगत सिंह को 5 महीने बाद 60,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया।

साइमन कमीशन और लाला लाजपत राय की हत्या

1928 में, ब्रिटिश सरकार ने भारतीय लोगों के लिए स्वायत्तता पर चर्चा करने के लिए साइमन कमीशन भारत भेजा। कई भारतीय राजनीतिक संगठनों ने इस आयोजन का बहिष्कार किया क्योंकि आयोग में कोई भारतीय प्रतिनिधि नहीं था। 30 अक्टूबर में, भगत सिंह के साथी, महान क्रांति कारी लाला लाजपत राय ने साइमन कमीशन आयोग के विरोध में एक मार्च का नेतृत्व किया। जिस पर पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट द्वारा लाठी चार्ज किया गया। पुलिस की लाठियों से लाला लाजपत राय बुरी तरीके से घायल ह गये। जिसके दो सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। जिस का आरोप ब्रिटिश सरकार ने उल्टा क्रांतिकारियों पर लगा दिया। जिससे भगत सिंह बहुत दुखी हुये।

सॉन्डर्स हत्याकांड

लाला लाजपत राय की मौत से आहत होकर भगत सिंह ने का बदला लेने की योजना बनाई। पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट को मारने के भगत सिंह और शिवराम राजगुरु, सुखदेव थापर, और चंद्रशेखर आज़ाद ने उस हमला किया। लेकिन स्कॉट की जगह पुलिस अधिकारी जॉन पी सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। उस के बाद उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाये लेकिन वो गिरफ्तारी से बचते रहे ।

इस हत्या की निंदा कांग्रेस नेता महात्मा गांधी ने की थी, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने बाद में लिखा था:
” भगत सिंह अपने आतंकवाद के कार्य के कारण लोकप्रिय नहीं हुए, बल्कि लाला लाजपत राय के सम्मान में, और उनके द्वारा राष्ट्र के लिए वंदना करने के कारण लोकप्रिय हुआ । वह एक प्रतीक बन गया, अधिनियम को भुला दिया गया, प्रतीक बना रहा, और कुछ महीनों के भीतर पंजाब के प्रत्येक शहर और गांव में, और शेष उत्तर भारत में कुछ हद तक, उसके नाम गूंजता रहा। उनकी लोकप्रियता ने जो कुछ हासिल किया वह कुछ अद्भुत था।” नेहरू ने भगत सिंह को आतंकवादी कहा था ।

19 दिसंबर 1928 को, दुर्गा भाभी, जो भगवती चरण वोहरा की पत्नी थीं, की सहायता से लाहौर से बठिंडा के रास्ते हावड़ा (कलकत्ता) जाने वाली ट्रेन पकड़ने का फैसला किया।

भगत सिंह और राजगुरु, दोनों लोडेड रिवाल्वर लेकर अगले दिन सुबह घर से बाहर निकले। पश्चिमी पोशाक पहने (भगत सिंह ने अपने बाल कटवाए, दाढ़ी मुंडवा ली और कटे बालों पर टोपी पहनी), और दुर्गा भाभी के सोते हुए बच्चे को साथ में ले लिया। भगत सिंह और दुर्गा भाभी पति-पत्नी, जबकि राजगुरु नौकर के रूप निकले । तीनों वहा निकलने में सफल हो गए।

1929 लाहौर विधानसभा में बम फेंकना

1929 में, भगत सिंह ने HSRA के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार हासिल करने के उद्देश्य से एक नाटकीय कार्य प्रस्तावित किया। भगत सिंह की योजना केंद्रीय विधान सभा के भीतर एक बम विस्फोट करने की थी। उनका इरादा सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक, और व्यापार विवाद अधिनियम के खिलाफ विरोध करना था। जिसे विधानसभा के खारिज करने के बावजूद वायसराय द्वारा अधिनियमित किया जा रहा था। उनका वास्तविक इरादा अपने आप को गिरफ्तार करवाना था ताकि वे अपनी क्रन्तिकारी सोच को सार्वजनिक करने के लिए एक मंच के रूप में अदालत में पेश हो सकें।

HSRA नेतृत्व शुरू में बमबारी में भगत की भागीदारी के विरोध में था क्योंकि वे जानते थे कि सॉन्डर्स हत्याकांड में उनकी गिरफ्तारी अंततः उनके लिए अच्छी नहीं होगी। 8 अप्रैल 1929 को, भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ, गैलरी से असेंबली कक्ष में दो बम फेंके। बमों को मारने के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था। जिससे किसी की मृत्यु हुई। बमों के धुएं ने विधानसभा को भर दिया। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त इस में बच सकते थे लेकिन भागने के बजाय, वे “इंकलाब जिंदाबाद!” के नारे लगाते रहे। दोनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

1929 विधानसभा का मुकदमा ट्रायल | 1929 Assembly case Trial

भगत सिंह ने इस प्रदर्शन से अंग्रेजी हुकूमत को ऊपर तक हिला डाला था। गांधी ने एक बार फिर से कड़े शब्दों में इस काम की आलोचना की थी । भगत सिंह ने ट्रायल में कहा था कि – “जब विरोध आक्रामक तरीके से लागू किया जाता है तो यह ‘हिंसा’ है और इसलिए नैतिक रूप से अनुचित है, लेकिन जब इसका उपयोग किसी वैध कारण के लिए किया जाता है, तो इसका नैतिक औचित्य है।”

मई में ट्रायल की कार्यवाही शुरू हुई जिसमें भगत सिंह ने अपना बचाव खुद करने की मांग की, जबकि बटुकेश्वर दत्त का प्रतिनिधित्व अफसर अली ने किया। अदालत ने विस्फोटों के दुर्भावनापूर्ण और गैरकानूनी इरादे का हवाला देते हुए आजीवन कारावास के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन इससे भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारो को पुरे भारत में पहुंचा दिया।

लाहौर केस ट्रायल और भूख हड़ताल

HSRA ने लाहौर और सहारनपुर में जो बम कारखाने स्थापित किए थे। 15 अप्रैल 1929 को पुलिस ने लाहौर बम फैक्ट्री छापा मारा, जिसमे सुखदेव, किशोरी लाल और जय गोपाल सहित एचएसआरए के बहुत से सदस्यों की गिरफ्तारी हुई। इसके कुछ समय बाद ही, सहारनपुर कारखाने पर छापा पड़ा और इसमें भी बहुत से सदस्य गिरफ्तार हुए । पुलिस ने सांडर्स हत्या, असेंबली बमबारी और बम निर्माण के तीन किस्सों को जोड़कर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और 21 अन्य पर सॉन्डर्स हत्या का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया।

28 जुलाई, 1929 को न्यायाधीश राय साहिब पंडित श्री किशन की अध्यक्षता में विशेष सत्र अदालत में 28 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा शुरू हुआ।

भगत सिंह और उनके साथी कैदियों ने गोरे बनाम देशी कैदियों के इलाज में पक्षपातपूर्ण अंतर के विरोध में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की घोषणा की और उन्हें ‘राजनीतिक कैदियों’ के रूप में मान्यता देने की मांग की। भूख हड़ताल ने प्रेस से जबरदस्त ध्यान आकर्षित किया और अपनी मांगों के पक्ष में प्रमुख सार्वजनिक समर्थन इकट्ठा किया। 63 दिनों के लंबे उपवास के बाद, जतिंद्र नाथ दास की मृत्यु हो गयी। 5 अक्टूबर, 1929 को भगत सिंह ने अंततः अपने पिता और कांग्रेस नेतृत्व के अनुरोध पर अपना 116 दिन लम्बा उपवास तोड़ दिया।

कानूनी कार्यवाही की धीमी गति के कारण, न्यायमूर्ति जे कोल्डस्ट्रीम, न्यायमूर्ति आगा हैदर और न्यायमूर्ति जीसी हिल्टन से युक्त एक विशेष न्यायाधिकरण की स्थापना 1 मई 1930 को वायसराय, लॉर्ड इरविन के निर्देश पर की गई थी। अंग्रेज सरकार ने अभियुक्तों की उपस्थिति के बिना और एकतरफा मुकदमा चलाया था जो सामान्य कानूनी अधिकारों के दिशानिर्देशों का पालन नहीं करता था।

फांसी की सजा | Sentence to Death

ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर 1930 को अपना 300 पन्नों का फैसला सुनाया। इनमे सॉन्डर्स हत्या में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के शामिल होने की पुष्टि की। भगत सिंह ने हत्या की बात स्वीकार की और परीक्षण के दौरान ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई ऐसे बयान दिए जो प्रेस के माध्यम से भारत के घर घर तक पहुंचे। जिनसे भारतीयों में क्रांति की अलख जगाई। केस में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत तक की सजा सुनाई गई।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 24 मार्च 1931 को फांसी देने का आदेश दिया गया। परन्तु विद्रोह के डर से 11 घंटे पहले ही तीनों को 23 मार्च 1931 को शाम 7:30 बजे लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। जो अब पाकिस्तान में स्थित है।

भगत सिंह के विचार

भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी थे और बहुत ही कम उम्र में देश शहीद गए। पारिवारिक पृष्ठ्भूमि क्रांतिकारी होने कारण वो बचपन से ही देश को आजाद कराने के सपने देखने लगे । यूरोपीय साहित्य के व्यापक पठन ने उनमे समाजवादी दृष्टिकोण उत्पन्न हुआ, जिसने भारत के लिए एक लोकतांत्रिक भविष्य की प्रबल इच्छा को जन्म दिया। यद्यपि एक सिख परिवार जन्म लेने के बाबजूद उन्होंने नास्तिकता को अपनाया। भगत सिंह का मानना था कि अंग्रेजो आजादी एक सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही ली जा सकती है। उन्होंने “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा दिया, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में आग किया। जिसे सभी क्रांतिकारियों ने अपनाया।

शहीद भगत सिंह के जीवन पर फिल्म | Movies on Bhagat Singh

शहीद भगत सिंह के जीवन कई फिल्म बनी है को लोगो को प्रेरणा देती है। “शहीद” (1965), “23rd मार्च 1931 : शहीद” और “द लीजेंड ऑफ भगत सिंह” (2002) जैसी कई फिल्में इस 23 वर्षीय महान क्रांतिकारी के जीवन पर बनी है। भगत सिंह के गीत “मोहे रंग दे बसंती चोला” और “सरफ़रोशिकी तमन्ना” आज भी भारतीयों में देशभक्ति की भावनाएं जगाते हैं। शहीद भगत सिंह के जीवन, उनकी विचारधाराओं और विरासत के बारे में कई किताबें, लेख और पत्र लिखे गए हैं। शहीद भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी विचारो को लोग आज भी याद करते है जो उनके जीवन को सार्थक बनता है। Biography of Bhagat Singh in Hindi.

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