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क्या आप जानते है कि अलाउद्दीन खिलजी ने सवा चौहत्तर मन सोना कहाँ से लूटा था ?

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भारत पर समय समय पर कई विदेशी आक्रांताओं ने लूट पाट के इरादे से बहुत सी बार आक्रमण किये। सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस भारत को इतना लूटा गया कि 20 वी शताब्दी तक भारत की गिनती गरीब देशों में होने लगी। इनमे लाखों लोगो ने अपने प्राण गवाए। लेकिन एक आक्रमण ऐसा भी हुआ था जिसमे चिताओं की राख से भी सवा चौहत्तर मन सोना लूटा गया

जी हाँ दोस्तों लूट के उद्देश्य से किया गया आक्रमण बहुत ही खतरनाक होता है। मुस्लिम आक्रांताओ ने जितने भी आक्रमण किये वे यहाँ से अकूत धन सम्पदा ले कर गए। इसके अलावा भी वे मंदिरो का विनाश, बलात्कार और हत्या भी करते थे। तालिबान के रूप में आप उसका एक छोटा सा रूप अभी अफगानिस्तान में देख सकते हो।

भारत पर समय समय पर ऐसे आक्रमण होते रहे है जिनमे हमारे बहादुर और जांबाज जवानों ने अपनी आखरी सांस तक लड़ते हुए अपने प्राणो का त्याग किया है। इनसे बचने के लिए हमारी औरतो ने भी अपने प्राणों का त्याग किया है।

अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ पर आक्रमण

ऐसे ही एक घटना सन 1303 में घटित हुई। जब चित्तौड़ के महाराजा रतन सिंह थे जो कि बहुत वीर और पराक्रमी थे। उनकी रानी पद्मनी थी वे बहुत सुन्दर थी। उस समय चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी ने बहुत ही विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। उसके मुकावले चित्तौड़ की सेना बहुत कम थी। उसके वाबजूद महाराजा रतन सिंह ने वीरता पूर्वक युद्ध किया लेकिन चपल अलाउद्दीन ने धोखे से उनका वध कर दिया। सभी युद्धा लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। जिसे केसरिया कहते है।

जब यह सुचना महारानी पद्मनी को मिली तो उन्होंने अपने आप को इन वहशी दरिंदो से बचाने के लिए जौहर किया। इस जौहर में करीब 16000 स्त्रियाँ शामिल थी। अपने आप को जिन्दा अग्नि में समर्पित करना ही जौहर कहलाता है। जौहर करने से पहले सभी ने अपने आप को गहनों से सजाया और फिर अग्नि में अपने आप को समर्पित किया।

अलालुदीन खिलजी जब महल में पंहुचा तो उसमें उसे चिताओं की राख मिली। खिजली ने उस को भी नहीं छोड़ा। चिताओं की राख से भी उसने सवा चौहत्तर मन सोना लूटा। आप इसी से इन लुटेरों के बारे में अंदाजा लगा सकते है। यह हमे इतिहास में नहीं पढ़ाया गया। लेकिन इसके बारे में मेवाड़ में अभी भी कई कहावत बोली जाती है।

प्रसिद्ध इतिहासकार अतुल रावत के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी ने चिताओं की राख से सवा चौहत्तर मन सोना लूटा था। 1 मन में करीब 40 kg होता है। इसके लिए अतुल रावत बताते है कि मेवाड़ क्षेत्र में उस महान बलिदान को याद करने के लिए एक लोक परम्परा प्रारम्भ की गयी थी। जब भी कोई पत्र लिखता था तो उस पर सवा चौहत्तर का अंक अंकित करता था। इसका मतलब यदि जिसको पत्र भेजा गया है उसके अलावा कोई भी उसको पड़ेगा तो उसको वही पाप लगेगा जो रानी पद्मनी की चिता से सवा चौहत्तर मन सोना लूटने पर अलाउद्दीन खिलजी को लगा था। यह परम्परा कुछ दशकों पहले तक चली आ रही थी। लेकिन अब नई पीढ़ी को यह सब कहां पता है। वैसे भी पत्र व्यवहार तो बंद हो चुका है और लोग उन चीज़ो को भूल रहे है।

समय बदल सकता है लेकिन इतिहास को हमें कभी नहीं भूलना चाहिए। इस दौर में तो जब विधर्मी ताकते सनातन धर्म तो नुकसान पहुंचाने का हर संभव प्रयास कर रही है। हमें हमारे इतिहास को फिर से लिखने की आवश्यकता है।

आप को यह जानकारी अलाउद्दीन खिलजी ने सवा चौहत्तर मन सोना कहाँ से लूटा था ? कैसी लगी कमेंट करके अवश्य बताए। इसको अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।

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